Sunday, August 26, 2012


बेहयायी का शिखर छूने को अब बेताब है।​ ये हमारी केंद्रसत्ता स्वयं में नायाब है।।​ लब्धियां इनकी गिनाने को नहीं हैं गिनतियां​ ​काली करतूतों से सारा दशक ही आबाद है।।​ ​बर्बाद करने को बहुत कुछ है अभी भी देश में​ ​इसलिए अब भी सदन में कांग्रेस जिंदाबाद है।। ​वो जो कहते हैं कि ये खा गए हैं कोयला​ ​उनको बताओ, ये सभी कालिख की ही औलाद हैं।।​ ​

Saturday, August 25, 2012


अपना देश रवायती है, वो भी आदिकाल से। रवायती बोले तो परंपरावादी। लीक-लीक चलने वाला। यूं तो लीक-लीक चलनेवालों को कायर-कुटिल-कपूत...और भी जाने क्या-क्या कहा गया है, परंतु कड़वा सच तो यह है कि लीक-लीक चल पाना भी बड़ी बात है। सूरतेहाल को देख तो यही कहना उचित होगा कि अब असली शूर-शायर-सपूत तो वो ही है जो लीक पर चल सके। लीक से भटककर चलने वाले तो सब ही हैं, लीक की निंदा-आलोचना करनेवालों की जमात पर जमात है। जिसे देखो बस लीक हिलाने की कवायद में लगा है। लीक न हुई, अंगद का पैर हो गया। ​सबको लगता है कि लीक से हटकर चलेंगे तो ही दिखेंगे, जलवा कुछ और होगा, लोग कहेंगे-शायर-सिंह-सपूत। कुछ लोग तो लीक बनाने में ही लग गए...एकदम नई लकदक लीक। ऐसी कि जो चले उसी के पैर फिसल जाएं-हड्डियों का सूरमा बन जाए। जुनून यह कि बस लीक बन जाए, कीमत चाहे कुछ भी चुकानी पड़े। अव्वल तो कीमत किसी और को ही चुकानी पड़ती है मगर फायदा लीक बनाने वाले का ही होता है। धन का फायदा-जन का फायदा...तन और मन के फायदे तो लगेहाथ चले आते हैं। कभी लीक गांवों से गुजरती थी पगडंडी बनकर...फिर शहर बने तो हाइवे और एक्सप्रेस-वे बनकर गुजरी। लीक क्या गुजरी, अलबत्ता लीक पर चलने वाले गुजरने लगे। शहरों की लीक पर रफ्तार तेज होती है, लिहाजा गुजरना भी तेज होता है। समय का चक्र बदला तो अपन लोग भी थोड़ा-थोड़ा लीक से हटे। जब लीक पर थे, तकलीफ कम थी। जमाना पुराना था और कोई एक्सप्रेस-वे नहीं था। कई बार तो यह होता कि चल पड़े जिधर दो डग मग में, बस उसी ओर लीक बन जाती थी। दरअसल लीक चलने भर से ही बन जाती थी, महत्वाकांक्षाओं की न तो ज्यादा रफ्तार थी न हाथ में दकियानूसी विकास की तलवार। फिर समय बदला। लीक का स्वरूप बदला। अब लीक एक्सप्रेस की रफ्तार पर है। हर कोई अपनी लीक बना रहा है...वो कहां जाती है, किसी को नहीं पता। ज्यादातर की लीक कुछ और नहीं, लीक के उलट दौड़ना भर है। ​असल लीक तो चरित्र की थी, धर्म की थी। मनुजता को शिखर की ओर ले जाने वाली लीक...व्यक्ति-व्यक्ति के चरम उन्नयन की लीक...अंधकार से प्रकाश की ओर ले जानी वाली लीक...माटी को अमृत बनाने वाली लीक। अब तकलीफ बढ़ गई है, क्योंकि लीक छूट गई है...हम धीरे-धीरे नई लीक पर जा रहे हैं...जाने कहां? ​अचंभा यह कि हम अब भी लीक-लीक ही चल रहे हैं-नई हो या पुरानी-क्या फर्क पड़ता है?

Friday, July 27, 2012

तिवारी जी, जीते तुम्हीं हो...

लाइव टेलिकास्ट ने माहौल ऐसा रचा है कि देखे बिना नहीं रहा जाता। चश्मा उतारकर, सिर झुकाकर आंख पर हाथ फेरते एनडी तिवारी, चश्मा चढाए छाती तानकर तीक्ष्ण कटुक्तियों के सहारे सत्यविजय का उद्घोष करती उज्ज्वला शर्मा...। एक के बाद एक दोनों के चेहरों कैमरे पर नचाए जा रहे हैं । उज्ज्वला आज किलक रही हैं-तिवारी ऐसे, तिवारी वैसे। वो कह रही हैं-ये सत्य की जीत है। तनिक कोई पूछे किस सत्य की जीत है। सत्य रह ही कहां गया था इस षड्यंत्रकारी खेल में। क्या वो कोई अलग सत्य है जिसका दंभ उज्ज्वला भर रही हैं। सत्य तो उसी दिन मटियामेट हो गया था जिस दिन श्रीमती उज्ज्वला अपने श्रीमान बीपी शर्मा से बावस्ता होते हुए भी बारास्ता एनडी तिवारी मां बनने के लिए उनके बिस्तर में घुसी थीं। एक सत्य यह था कि वे किसी और की श्रीमती थीं। एक सत्य था कि उनके पति उन्हें मातृसुख दे पाने में अक्षम थे। एक सत्य था कि उनके भीतर वासना-पुत्रकामना बरजोर थी। एक सत्य था कि उन्हें इसके लिए किसी और के संग हमबिस्तर होने से कोई गुरेज न था। प्रेम के पांखड में एक आदमकद व्यक्तित्व से यौनेच्छा शांत करने की आग एक सत्य ही थी। डीएनए का सत्य यदि सत्य है तो यह साफ है कि बाकी सब सत्य भी शिखरसत्य हैं। इन सत्यों को सिद्ध करने के लिए किसी डीएनए परीक्षण की अनिवार्यता नहीं, किसी आयोग की आवश्यकता नहीं, किसी न्यायालय और न्यायमूर्ति की दरकार नहीं। एक डीएनए रिपोर्ट ने यह सब सिद्ध कर दिया है। उज्ज्वला जी, तुम एक सत्य जीतकर सौ सत्य हार गई हो और तिवारी जी एक सत्य हारकर भी बाक सब सत्य जीत गए हैं। अंतिम जीत उन्हीं की रही है।

Monday, July 23, 2012

प्रेम का अमृत

जीवन के घट में​ ​जितना जल आया​ ​मैंने पीया-औरों को पिलाया​ ​तुम पास आए, बैठो​ ​तुम्हें भी तृप्ति मिलेगी​ ​जल नहीं बचा​ ​मैं तो ​तुम्हारे लिए ​
ले आया...

Tuesday, January 10, 2012

ख्याल

एकबार ख्याल आया-धर्म इस संसार में कितना निंदनीय हो गया है, फिर इस पथ क्यों चलना चाहिए। फिर मैंने संगति बदल दी। अब सोचता हूं कि निंदा करने वाले हैं ही कितने और हमें धर्मपथ पर ही क्यों नहीं चलना चाहिए।

कुत्ता हड्डियां चबाता है...सूखी हड्डियां उसी की जिह्वा और जबड़े को काट डालती हैं...अपने ही खून को पीता हुआ वो कितना मगन रहता है? आज का मनुष्य भी अपवाद नहीं रहा। जीवन-रस सूख चुका है, बस ईर्ष्या और पाखंड की सूखी हड्डियां ही उसके जीवन का स्वाद रह गई हैं।

हम उसकी आवाज नहीं सुन रहे। कौन नहीं जान रहा कि जीवन एक-एक दिन मौत की ओर सरक रहा है...कालपुरुष बड़ी निर्दयता से गला घोंटने को तैयार है...चिता बिछी पड़ी है...सिर्फ कुछ श्वासों की देर है...कौन सी श्वास अंतिम होगी, बस इसी का तो इंतजार है हम सबको..

Sunday, January 1, 2012

चल रे साथी

आगत के स्वागत का ये पल​
​विस्मृत कर दे दुःखभरा कल​
​मधु गीतों से झूम उठे मन​
​नयनों में भर सपन नवल​
​​चल रे साथी...नई जगह चल।।​
​​
​बहुत हो चुका रोना-धोना​
​न कुछ पाना न अब खोना​
​धरती से उठकर चल दें​
​बनें शून्य का नीलकमल।।
चल रे साथी...नई जगह चल।। ​
​​
बरस-बरस बस बीत रहा​
​आगत कभी अतीत रहा​
​अब यथार्थ को जीना सीखें​​
​बहुत सह चुके समय का छल।​
​चल रे साथी...नई जगह चल।।

Friday, December 30, 2011

​पूर्वजन्म, सच, मसीह, ​रावण

आज हरिद्वार से लौटा हूं...वहां "​पूर्वजन्म" के एक मित्र से भेंट हुई। ठीक एक जन्म पहले हम एक-दूसरे को जानते रहे होंगे। ध्यान करते समय गहरी अनुभूति हुई। इस बार "सुरसरि" का वेग तीव्र था। स्नान करने उतरा तो लगा जम गया हूं। मुश्किल से पांच डुबकियां लगाईं। रामकृष्ण परमहंस होते तो कहते-एक भी डुबकी ढंग की न लगी। लग जाती तो बाहर क्योंकर दिखते?​
​​
जो कहूंगा, सच कहूंगा। सच नहीं कह सका तो भी चुप नहीं रहूंगा। क्योंकि...यदि मैं सच न हो सका तो और कौन हो सकेगा? ​
​​
जो मेरी प्रशंसा करते हैं और जो मेरी निंदा करते हैं-वे उस परमात्मा के बनाए कभी नहीं हो सकते जो प्रशंसा और निंदा, सुख और दुःख, मान और अपमान जैसे द्वंद्वों के पार है। उनका सिरजनहार कोई और ही है। जो किसी और का है, वो बस दया का पात्र है। इस संसार में प्रभु की संतानों को छोड़ शेष सब दीन हैं। ​
​​
​ईसा मसीह कहते हैं-हे प्रभु, इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं। मैं कहता हूं-हे प्रभु, इन्हें तब भी क्षमा करना जब ये जान रहे हों कि ये क्या कर रहे हैं? ​
​​​
​रावण मूर्ख है। वो नकली संत बनता है...घड़ीभर के लिए। भिक्षा मांगता है सीता से। सीता एक झूठे ऋषि के लिए भी सारी सीमा-रेखाएं पार कर जाती हैं। कितनी उदारता है..। एक झूठे संत के संग का फलन यह है कि उसे बरसों कठिन यंत्रणा में राक्षसों के बीच बिताना पड़ता है। और रावण, इतना मूढ़...समझ ही नहीं पाता कि यदि क्षणभर का झूठा साधुपना सीताजैसी दिव्यशक्ति की निकटता बरसों तक दे सकता है तो सच्चा संत बन जाने पर क्या होगा?​​
​​​
​

Sunday, November 27, 2011

क्षण-क्षण-१

1-कंपन का अर्थ है झूठा व्यक्तित्व। शारीरिक-मानसिक-नैतिक...और सबसे बढ़कर आध्यात्मिक रूप से असहाय। आत्मा से क्षीण जीव हरक्षण कांपता है। आत्मा का अर्थ है-सत्य के सर्वाधिक निकट अस्तित्व।​
​2-सुना है जो डर गया वो मर गया। लेकिन जो मरने के बाद भी डरता रहे, उसका क्या। ​

Wednesday, November 16, 2011

क्षण-क्षण

जो तुम्हारा सच है और जो मेरा सच है, दोनों में ठीक उतना ही अंतर है जितना असली एवं नकली सोने में। मेरा सत्य स्वयं से दीप्त है और तुम्हारा सत्य तुम्हारी भ्रष्ट आत्मा पर चढ़ाया गया चमकीला मुलम्माभर।

वे नश्तर चुभो रहे थे...बार-बार...यहां-वहां...पूरी देह में। मैं सहता रहा...देह मेरी थी..वेदना मुझे थी...मैंने नश्तर छीना और कलेजे में उतार लिया। अब मैं वेदना से मुक्त हूं।

जब तुमपर उंगली उठे तो पहले उसकी दिशा देखो, फिर अपनी ओर। उंगली उठती ही जाए तो समझो, कि अब तलवार निकालकर उंगली उठानेवाले का हाथ काट देने का वक्त आ गया है, बशर्त्त तुम सही हो।

Sunday, October 23, 2011

दीपपर्व


हाथ में काठ लिए​
​मन में कुछ गांठ लिए​
​और झूठी ठाठ लिए​
​जीवन भर सोचते रहे​
सिर के बाल नोचते रहे​
​और सबको कोसते रहे​​
​अंधेरा हटाना है​​
​कलंक मिटाना है​
​छछूंदर को डराना है​
​दिख न सका तथ्य यह​
​भंगुर यह, मृत्य यह​
​तमस कहां सत्य यह
अजी, किसको​​ मिटाना है​
​किसको हटाना है​
​और क्यों किसी को डराना है​​
​ये जो हाथ का काठ है​
​मन की जो गांठ है​
​और झूठा जो ठाठ​ है​
​यही असल रोग है​
मृत्यु-मरण योग है​
​​मनुजता का सोग है​
जो करना-कराना है​
वो यह कि गीत एक गाना है​
​और, नन्हा-सा दीपभर जलाना है।।​
​दीपपर्व की मंगलकामनाओं के साथ-​
​आशुतोष

Wednesday, September 14, 2011

क्षणिका

रात को दिन दिनों को रात करें।​
सही-गलत सही, कुछ तो बात करें।​।​
​​कोई कहे-न कहे पर छुपी रहेगी नहीं
​चोट खाए हुए कह देंगे जज्बात हरे।​
अकल जो होती तो आ जाती ​समझ ​​
​आग दामन में लिए कौन मुलाकात करे।।
​​आंख पुरनम, जुबां पे ​खामोशी ​
टूटे हुए हमदम कहां फरियाद करें।
​न कोई उज्र न शिकायत अब है
​चल ऐ दिल, इश्क की शुरुआत करें।।​

Sunday, July 31, 2011

अनमन


​पीर मचलती पार क्षितिज के​
छू लो मेरे मन।​
​हंस लो मेरे मन।।​
​​
​वट की स्नेहभरी छाया हो​
​फिर भी कहां पनपता जीवन?​
​कैसे कह दूं मिल जाएगा​
​तुमको सपनों का उपवन।।​
​​
​यों न लिपट जड़संकुल से​
​झूलो मानस-घन।​
​​
​शून्य ससीमित माना मैने​
​देख तुम्हारी पीड़ा पागल।​​
अंक दग्ध हो गया लहू से​
​धधक उठा ​मेरा उर घायल।।​
​​
​घूम-घूम कोने-अंतरे​
सरसो प्रेम-सुमन।।
​​
​​पीर मचलती पार क्षितिज के​
छू लो मेरे मन।​
​हंस लो मेरे मन।।​
​​

Thursday, March 31, 2011

इदन्नमम


चाहता हूं जब​
​कि, कह दूं​
​खिलखिलाकर तुम हंसो​
​एक बरछी वेदना की​
​घातिनी बन बींध जाती है...​
​
​​चाहता हूं जब​
​कि, तुम ​
दृढ़व्रती हो कुछ कहो​​
​वज्र-सी बिजुरी​
​हृदय को चीर जाती है...​
​​
​मौन में बैठे ​
​तुम्हें​ जब देखता हूं​​
​श्वास की गहराइयों में
​निर्दयी-सी पीर​
दृगभर नाच जाती है...
​​
​चाहता संवाद मन​
​जब तुम्हारे अश्रुओं से​
​कांपती कोई हवा​
​स्वर-शिखाओं को बुझा​
दीप-उर को तोड़ जाती है...​
​​
​क्या करूं निज नेह का​
​चाहता जो तुम हंसो​​
​अधर से लिपटी​
​विषैली वेदना को पंख दो​...
​​
​क्या करूं वो भावना​
​चाहती तुम मुखर हो​​
मरण-उन्मुख आस्था को​
​निज परस से प्राण दो...
​​
​मानता...हां, मानता हूं​
​मौन सबकुछ बोलता है...​​
​शब्द के सीमांत के​
​भेद सारे खोलता है
​किंतु, मेरे आत्मन!​
​प्रीति मेरे! प्राणघन​!
कैसे कहूं-निस्तब्धता​
​अब बहुत ही दाहती है...​
मौन की विषमय तरलता
आत्मा को मारती है...​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​

Saturday, February 19, 2011

गुस्ताखी माफ़


आत्मीय जन,​ लंबे समय बाद एक क्षणिका उतरी है। सबको निवेदितl कर रहा हूं। स्वीकार करें-
​पाषाण नहीं, ये हृदयकमल है​
​यहां हलाहल वर्जित है।​
​मानसरोवर जिसका मन​
​उसके लिए समर्पित है।।​​

Saturday, December 4, 2010

स्पेक्ट्रम घोटाला


जागो मेरे देश​
​बहुत ही कठिन घड़ी है।​
​हर ओर राडिया-सी​
​सुरसा मुंहखोल खड़ी है।​।​​
​राजाओं के जाने कितने​
​छल उघड़ेंगे।​
​बरखाओं के पट से जब​
​कंचुकि खिसकेंगे।।​
​वीर तुम्हारे जाने ​कितने ​
​अभी पड़े हैं।​
​सतरंगी घोटालों में ​
​आकंठ गड़े हैं।।​
​पूंजीपतियों की आस्तीन​
में ही नाग पले।
​शनैः-शनैः टाटा-अंबानी ​
​सबके खेल खुले।।​
​क्षण में लाख-करोड़ों के​
​मसविदे तयार हुए।​
​किसने देखा कर्जतले​​
​कितने तन छार हुए।​।
सेंसेक्स की संख्या पर​
​​​खूब उछलता था।​
​कंगाल राष्ट्र बस दावों में​
​आगे बढ़ता था।​।
​राजनीति के हाथों में​
​आकर निचुड़ गए।​
​पेट गरीबों के
भूख से ​
सिकुड़ गए।।​
​सत्ता मूक-बधिर है​​​
​महिषी अंधी है।​
​दुःशासन हंस रहा​
​द्रौपदी नंगी है।।​
जुए में सब​ फंसे​
​भेद कौन खोलेगा।
​​रार ठनेगी, भीष्म ​
​अगर बोलेगा।​।
​सोचा था, कुछ न्याय​
पालिका तोलेगी।​
​और, जरूरत पड़ी​
​मूक जनता बोलेगी।।​
​भ्रष्टतंत्र के धुरविरोध में​
​लोग चलेंगे।​
​पाषाण हो चुके देव​
​तनिक तो पिघलेंगे।।​
​मुट्ठियां भिंचेंगी​
​​उर में भूचाल उठेगा।​
​​​जिस्मों पर तारी​
कायरता का जाल कटेगा।।​
​देख रहा हूं, किंतु​
यहां सब उलटा है।​
​हर शख्स मौज में​
​और, व्यवस्था जिंदा है।।​
लगता है उम्मीदें ​
सब बेमानी हैं।​
​लहू नहीं, ​​अब जिस्म​-​
​जिस्म में​ पानी है।।​​

Tuesday, November 30, 2010

नागार्जुन...गाली देकर


ऐसा नहीं है कि काव्य से मन भर गया है, न ही गद्य-लेखन में हाथ आजमाने की मंशा है। कोई धुरंधर लिक्खाड़ नहीं हूं, दूसरे शब्दों में कहें तो इसका दावा नहीं करता हूं। आजकल रोज मन उचट रहा है। रात-रात जागता हूं, दिन-दिन चिंतन करता हूं। चिंता है देश की, समाज की-आत्मघात की ओर बढ़ रही आदमीयत की। घोटालों से परदा उठना शुरू हुआ है, तो मेरे मन का कलुष धुलने लगा है। ज्योतिषी नहीं हूं परंतु आभास था कि सत्ता के पदतले बहुतों की चीख-पुकार दबी है। राजा हो या महाराजा, अब साफ होने लगा है कि प्रजा उनके लिए मात्र एक खिलौना है..खिलौना भी निर्जीव। चाहे जितना तोड़ो-मरोड़ो, कोई आह भी नहीं निकलती। यों तो मैं प्रायः सो जाता था, किंतु एक रात अचानक नागार्जुन आ खड़े हुए। पहले लगा स्वप्न देख रहा हूं, फिर सोचा कि जब सो ही नहीं रहा तो स्वप्न कैसा। देखकर हिम्मत बढ़ी। नागार्जुन बिहार के थे-कविता के जरिए कांटों का हार पहनकर निकलते थे। सौ गालियां मुझे निकालीं और कहा कि तूने पढ़ाई लिखाई काहे के लिए की। मैं बोला-पहले तो पता ही नहीं था, थोड़ा समझ बढ़ी तो लगा कि नौकरी वगैरह के लिए जरूरी है, सो पढ़ लिया। उन्होंने फिर पूछा-नौकरी क्यों की..। मैं बोला-घर-परिवार के लिए। सहसा उन्होंने घूरा और बोले-स्साले, नौकरी और घर-परिवार के लिए तो हर कोई जीता है, तुझमें अलग क्या है। मैं बोला-पता नहीं। बाबा, मेरा दिमाग मत खाओ, जो कहना है साफ-साफ कहो। रात के तीन बज रहे हैं, या तो जाओ या मझे सो जाने दो। वे मेरा सिर सहलाने लगे। फिर उन्होंने कहा-देख बेटा, तू कविता लिखता है। अच्छा लगता है। बस एक काम कर। कुछ दिनों के लिए मुझे अपने भीतर पनाह दे दे। मैंने कहा-क्यों? वे बोले-इन स्साले राजनीतिज्ञों को कुछ गाली निकालनी है। मरते समय दिल में कुछ कसक रह गई थी, सो अब तू पूरा कर लेने दे। मैं पहले तो अचकचाया, फिर मुझे लगा कि बाबा सही ही बोलता है। इस राजतंत्र में, राजनीति में बचा ही क्या है। सारा तंत्र सड़ा-गला है। आमजन इसके बोझ तले दबा मरा जा रहा है। इससे बचा कैसे जा सकता है? जाहिर है कि इसकी जड़ खोदनी होगी, इसे तबाह करना होगा। इस देश को एक बार पूरा का पूरा झाड़ना होगा। जन को कोसना होगा, धन को कोसना होगा। राजनीति को हटाना होगा, राजनेताओं को हटाना होगा। इन्हें हटाया एक ही तरीके से जा सकता है-गाली देकर। सर्वोत्तम उपाय है गाली। इन्हें ​हर कोई गरियाए, पानी पी-पीकर कोसे। आमदिन हों या चुनाव के-इनको इनके काले चिट्ठे दिखाओ। हर जन के मुंह पर स्पेक्ट्रम लग जाए ताकि एक-एक गाली अनेक रंगों से होकर आए। द्वार-द्वार पर गाली होगे-जिह्वा-जिह्वा पर आलोचना के विषस्वर हों। जो काव्य में दे सके, काव्य में दे, गद्य की विधा हो तो गद्य में-बस गाली दे। कुछ ही दिन..और आप बहुत कुछ बदलता महसूस करेंगे। और, अगर यह गाली देना शुरू न हुआ तो जल्द ही सबकुछ मरता हुआ देखेंगे। राजनीति पतन की पराकाष्टा पर पहुंच चुकी है, जन मरण के कगार पर। जागने का क्षण आज है, अभी ही। मैंने नागार्जुन को अपनी काया में पनाह दे दी है, अब बारी आपकी है।
​​
​
​​
​ ​
​​
​​
​

Wednesday, November 24, 2010

विद्रोह


(​आत्मीय स्वजन, ​
​बहुत दिनों से व्यथित था। समझ नहीं पा रहा था क्या करूं। ​देश की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। गहरा प्रतिकार उठा है। सोचता हूं चंद लोग भी साथ चलें तो कुछ बदल सकता है। यह कविता एक गाली है। अच्छा बुरा नहीं जानता-नहीं जानना चाहता। अगर राष्ट्र को बचाना है-समाज एवं धर्म को बचाना है तो कुछ करना होगा। चार रौद्र कविताएं हैं। पहली प्रकाशित कर रहा हूं। आप साथ रहे तो आगे बढ़ूंगा अन्यता अकेला चलूंगा।​
​क्या कहते हो।​​)

आज बहुत मन खिन्न है।
दुनिया-दीन से भिन्न है।।
रोम-रोम में गाली है।
घृणा कंठ में पाली है।।
अतिरेक कहीं हो जाए न।
उदिध विकल हो जाए न।।
डर है सुनामी आने का।
लाशों के बिछ जाने का।।
नगर-नगर चौपट होंगे।
हर ओर बसे मरघट होंगे।।
बस चीख-पुकारे गूंजेगी।
और, दिशाएं सोचेंगी।
क्यों सागर असमय उछला।
किस अपराध का ये बदला।।
उत्तर न किसी से दे होगा।
मूक अश्रु पीना होगा।।
यदि विप्लव से बचना है।
शंखनाद यह सुनना है।।
कहता हूं, कान खुले रखना।
और, सत्य पर दृढ़ रहना।
हठधर्म नहीं सद्धर्म जिएगा।
राम-कृ ष्ण का कर्म जिएगा।।
असिधार अहिंसा तोलेगी।
शोणितधारा पथ खोलेगी।।
भालनोक पर सिर उछलेगा।
शव-शव शिव-शिव-हरि बोलेगा।
वीयर्हीन क्या जाचेंगे।
कमर्कांड भर बांचेंगे।
पुरुषत्वहीन सब सह लेंगे।
धर्म बिना भी रह लेंगे।।
किंतु स्वधर्मी ना जीएगा।
अमिय त्याग विष न पीएगा।
वो सत्ता से जूझेगा।
प्राण शंख में फूंकेगा।।
नहीं सहेगा दमन कभी भी।
और, सत्य का शमन कभी भी।।
लगे किसी को भले अनर्गल ​
​भले कहे कोई दुर्बाद।
सत्य यही है, आज विधर्मी ​
छांट रहे हैं "गांधीवाद।।"
निरपेक्ष हुआ बस एक धर्म है।
तुष्टिकरण ही महत्कर्म है।।
राम मरे, मर जाए सीता
कृष्ण जरें, जरि जाए गीता।।
बाबर यहां दामाद है।
राम कथानकवाद है।।
गौरी-गजनी-चंगेज भले।
लूटे-खाए गए चले।।
आज वही आदर्श हैं।
मानव के उत्कर्ष हैं।।
राम झूठ रामायण गल्प।
कृष्ण शास्त्रछल का संकल्प।।
ऋषि परम्परा थोथी है।
महज कल्पना-पोथी है।।
रामसेतु परिहास है।
कल्पित है, बकवास है।।
सच कागज के नोट हैं।
औ" मुस्लिम के वोट हैं।।
हिंदू आतंकी-उन्मत्त।​
​विश्वविदित हिंसक-पथभ्रष्ट।।
धर्म गया, ईमान गया।
पुण्य-पाप संधान गया।
शंख बजाना पाप है।
मिला नया अभिशाप है।।
मंदिर पर अधिकार नहीं।
सामाजिक स्वीकार नहीं।।
बेटी-बहू बलत्कृत है।
जिह्वा भू पर लुंठित है।।
चीख निकल न पाती है।
पाषाण हो चुकी छाती है।।
राजनीति का मकड़ा है।
बुरी तरह से जकड़ा है।।
पुंसत्वहीन सब सत्ता में।​
​यूपी-दिल्ली-कलकत्ता में।।
चला रहे हैं गोरखधंधे।
दल के दल-दलदल गंदे।।
सरदार ठूंठ है निगुरा है।
राजनीति का मोहरा है।।
रानी के इशारे हिलता है।
हिलता है तो मिलता है।।
हिलना-मिलना बंद न होगा।
गोरखधंधा मंद न होगा।
कलमाड़ी भी, गलमाड़ी भी।
खा गए आंगन भी, बाड़ी भी।
शरद पंवारा चलता है।
देश भूख से मरता है।।
अंबर बाकी, चित्त मर गया।
चिदंबरम का वृत्त मर गया।
भगवा से नाराजी है।
खबर एक ही ताजी है।​।
पासवान के पास नहीं है।
मथुरा-कासी रास नहीं है।।
माया के परपंच न घटते।
सारे दिग्जग शीश पटकते।।
गलियों में-चौबारों में​।
​चौक और चौराहों पे।।
जन-जन की खटिया खड़ी हो गई।
रखैल देश से बड़ी हो गई।
लालू की नथ न उतरेगी।
सपा वस्त्र अब क्या पहरेगी।।
कांग्रेस की आंख का पानी।
बूढ़ी वेश्या पर चढ़ी जवानी।।
देश की इज्जत तार-तार है।
मस्ती में वेश्या बजार है।।
विवसन होती बहू-बेटियां।
फेंक रही भाजपा गोटियां।।
देखो कैसी लूट मची है।
बस, टांगों में आंख फं सी है।।
मुफ्ती के नैनाविलास में।
आतंकी पलते प्रवास में।।
हिंदुविरोधी स्तुति में।
राष्ट्रविरोधी प्रस्तुति में।।​
​सारे जन ही उत्सुक हैं।
मानवाधिकारी प्रस्तुत हैं।।​
​कुछ इनके कुछ उनके हैं।
कुछ अपने ही मन के हैं।।
नब्बे फीसद अपराधी हैं।
संसद में सब साझी हैं।।
इनके हाथों कौन बचेगा।
देश छलेगा और जलेगा।।
राजनीति पर थूक रहा हूं।
क्रांतिशंख फिर फूंक रहा हूं।।
बुद्धि मरण में माती है।
जिसे व्यवस्था भाती है।।
जो इसमें विद्रूप सने हैं।
माटी के वे लोग बने हैं।।
यह तंत्र समर्थित जिनका है।।
मुर्दा हैं, क्या उनका है।।
और, सहा न जाता है।
हृदय फटा ही जाता है।।
कारा कठिन मिटानी है।
मुझको आग लगानी है।।

Saturday, November 13, 2010

मुर्दाघर


कभी-कभी ​
सारा दृश्य​​
​बदल जाता है
​संसार
​मुर्दाघर सा लगता है​
​लोगबाग​
​बस दौड़ती हुई लाशें​
​कभी-कभी ​
लगता है
​यहां कुछ ​
​जिंदा नहीं है​
कुछ मुर्दाखोर हैं​
​और, कुछ-
​चीर-फाड़ करने वाले​​
कृत्रिम रुदन है​
​घुटी हुई चीखें
​सड़े हुए मांस​
​और, उनसे रिसता​
​​लिजलिजापन
​इस लिजलिजेपन में​
सहमी हुई-सी ​
​कुछ ​जिंदगियां..
​​मन करता है​
​उन्हें बचा लूं
​पर, ​क्या करूं
​इन मरे हुए लोगों का​
​मुर्दाखोरों का​
​​इन्हें दिलासा दूं​
​सहानुभूति जताऊं​
​व्यवस्था से​
​शिकायत करूं
अथवा, समूचे श्मशान में​
​आग लगा दूं...

Wednesday, November 3, 2010

ह्रदयदीप


हर दीया ​
माटी का है​
​बुझ जाएगा​​
​तेल चुकेगा
​​बाती भी​
​जल जाएगी​​
​तिमिर घना​
घिर आएगा​
​घात लगेंगे​...
​​​​तन छीजेगा​
​मन टूटेगा
​कठिन बहुत​
​जीना होगा​
विष ही ​
​पीना होगा​?
​विष पीकर भी​
प्राण धरेंगे​
​अमरित का​
​उत्सर्ग करेंगे​
दीया टूटे​
​बाती रूठे​
​तेल चुके​
​सब साथी छूटें​
​किंतु, ​न तम से​
​हारेंगे​
दीप ह्रदय का​
​बारेंगे
माटी के क्यों
दीप धरेंगे​​
​क्षणभंगुर से ​
​प्रीति करेंगे​!​ ​
​जब तक मन​
​चैतन्य भरा है​
​और, ह्रदय में​
प्रेम खरा है​
​हम ही बाती​
​दीप बनेंगे​
​उस चिन्मय ​की​
​ज्योति बनेंगे​
​तेल नहीं यह रीतेगा​
​और, प्राण न छीजेगा​
​फिर, शाश्वत ​
​भरमन होगा​
​दीपोत्सव ​
​हरक्षण होगा।।​
(​आप सभी को दीपपर्व की मंगलकामना।)​

Friday, October 15, 2010

तुकतुक

बड़ी आंखों के बड़े फायदे हैं...
पानी न हो तो लोग डर जाते हैं
और पानी ज्यादा हो तो डूबकर मर जाते हैं...।।