Wednesday, November 24, 2010

विद्रोह


(​आत्मीय स्वजन, ​
बहुत दिनों से व्यथित था। समझ नहीं पा रहा था क्या करूं।देश की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। गहरा प्रतिकार उठा है। सोचता हूं चंद लोग भी साथ चलें तो कुछ बदल सकता है। यह कविता एक गाली है। अच्छा बुरा नहीं जानता-नहीं जानना चाहता। अगर राष्ट्र को बचाना है-समाज एवं धर्म को बचाना है तो कुछ करना होगा। चार रौद्र कविताएं हैं। पहली प्रकाशित कर रहा हूं। आप साथ रहे तो आगे बढ़ूंगा अन्यता अकेला चलूंगा।
क्या कहते हो।​​)

आज बहुत मन खिन्न है।
दुनिया-दीन से भिन्न है।।
रोम-रोम में गाली है।
घृणा कंठ में पाली है।।
अतिरेक कहीं हो जाए न।
उदिध विकल हो जाए न।।
डर है सुनामी आने का।
लाशों के बिछ जाने का।।
नगर-नगर चौपट होंगे।
हर ओर बसे मरघट होंगे।।
बस चीख-पुकारे गूंजेगी।
और, दिशाएं सोचेंगी।
क्यों सागर असमय उछला।
किस अपराध का ये बदला।।
उत्तर किसी से दे होगा।
मूक अश्रु पीना होगा।।
यदि विप्लव से बचना है।
शंखनाद यह सुनना है।।
कहता हूं, कान खुले रखना।
और, सत्य पर दृढ़ रहना।
हठधर्म नहीं सद्धर्म जिएगा।
राम-कृ ष्ण का कर्म जिएगा।।
असिधार अहिंसा तोलेगी।
शोणितधारा पथ खोलेगी।।
भालनोक पर सिर उछलेगा।
शव-शव शिव-शिव-हरि बोलेगा।
वीयर्हीन क्या जाचेंगे।
कमर्कांड भर बांचेंगे।
पुरुषत्वहीन सब सह लेंगे।
धर्म बिना भी रह लेंगे।।
किंतु स्वधर्मी ना जीएगा।
अमिय त्याग विष पीएगा।
वो सत्ता से जूझेगा।
प्राण शंख में फूंकेगा।।
नहीं सहेगा दमन कभी भी।
और, सत्य का शमन कभी भी।।
लगे किसी को भले अनर्गल
भले कहे कोई दुर्बाद।
सत्य यही है, आज विधर्मी
छांट रहे हैं "गांधीवाद।।"
निरपेक्ष हुआ बस एक धर्म है।
तुष्टिकरण ही महत्कर्म है।।
राम मरे, मर जाए सीता
कृष्ण जरें, जरि जाए गीता।।
बाबर यहां दामाद है।
राम कथानकवाद है।।
गौरी-गजनी-चंगेज भले।
लूटे-खाए गए चले।।
आज वही आदर्श हैं।
मानव के उत्कर्ष हैं।।
राम झूठ रामायण गल्प।
कृष्ण शास्त्रछल का संकल्प।।
ऋषि परम्परा थोथी है।
महज कल्पना-पोथी है।।
रामसेतु परिहास है।
कल्पित है, बकवास है।।
सच कागज के नोट हैं।
" मुस्लिम के वोट हैं।।
हिंदू आतंकी-उन्मत्त।
विश्वविदित हिंसक-पथभ्रष्ट।।
धर्म गया, ईमान गया।
पुण्य-पाप संधान गया।
शंख बजाना पाप है।
मिला नया अभिशाप है।।
मंदिर पर अधिकार नहीं।
सामाजिक स्वीकार नहीं।।
बेटी-बहू बलत्कृत है।
जिह्वा भू पर लुंठित है।।
चीख निकल पाती है।
पाषाण हो चुकी छाती है।।
राजनीति का मकड़ा है।
बुरी तरह से जकड़ा है।।
पुंसत्वहीन सब सत्ता में।
यूपी-दिल्ली-कलकत्ता में।।
चला रहे हैं गोरखधंधे।
दल के दल-दलदल गंदे।।
सरदार ठूंठ है निगुरा है।
राजनीति का मोहरा है।।
रानी के इशारे हिलता है।
हिलता है तो मिलता है।।
हिलना-मिलना बंद होगा।
गोरखधंधा मंद होगा।
कलमाड़ी भी, गलमाड़ी भी।
खा गए आंगन भी, बाड़ी भी।
शरद पंवारा चलता है।
देश भूख से मरता है।।
अंबर बाकी, चित्त मर गया।
चिदंबरम का वृत्त मर गया।
भगवा से नाराजी है।
खबर एक ही ताजी है।
पासवान के पास नहीं है।
मथुरा-कासी रास नहीं है।।
माया के परपंच घटते।
सारे दिग्जग शीश पटकते।।
गलियों में-चौबारों में
चौक और चौराहों पे।।
जन-जन की खटिया खड़ी हो गई।
रखैल देश से बड़ी हो गई।
लालू की नथ उतरेगी।
सपा वस्त्र अब क्या पहरेगी।।
कांग्रेस की आंख का पानी।
बूढ़ी वेश्या पर चढ़ी जवानी।।
देश की इज्जत तार-तार है।
मस्ती में वेश्या बजार है।।
विवसन होती बहू-बेटियां।
फेंक रही भाजपा गोटियां।।
देखो कैसी लूट मची है।
बस, टांगों में आंख फं सी है।।
मुफ्ती के नैनाविलास में।
आतंकी पलते प्रवास में।।
हिंदुविरोधी स्तुति में।
राष्ट्रविरोधी प्रस्तुति में।।
सारे जन ही उत्सुक हैं।
मानवाधिकारी प्रस्तुत हैं।।
कुछ इनके कुछ उनके हैं।
कुछ अपने ही मन के हैं।।
नब्बे फीसद अपराधी हैं।
संसद में सब साझी हैं।।
इनके हाथों कौन बचेगा।
देश छलेगा और जलेगा।।
राजनीति पर थूक रहा हूं।
क्रांतिशंख फिर फूंक रहा हूं।।
बुद्धि मरण में माती है।
जिसे व्यवस्था भाती है।।
जो इसमें विद्रूप सने हैं।
माटी के वे लोग बने हैं।।
यह तंत्र समर्थित जिनका है।।
मुर्दा हैं, क्या उनका है।।
और, सहा जाता है।
हृदय फटा ही जाता है।।
कारा कठिन मिटानी है।
मुझको आग लगानी है।।

19 comments:

shalini said...

achchhi hai par lambi hai kafi

पंकज मिश्रा said...

क्या कहने वाह वाह वाह।
बहुत दिन बाद आपकी ओर से कुछ पढऩे को मिला। लेकिन जब मिला तो अच्छा मिला। बहुत अच्छा है। मैं साथ हूं आप आगे बढ़ो, और अन्य कविताएं भी प्रकाशित करो। आपको बहुत साधुवाद और धन्यवाद।
और हां, शालिनी जी की बात से सहमत हूं कि बहुत लम्बी है, पर अच्छी है इसलिए खटकी नहीं। कुछ चीजें ऐसी ही अच्छी लगती हैं।

shalini kaushik said...

aur saha na jata hai,
hriday fata hi jata hai ,
kara kathin mitani hai
mujhko aag lagani hai.
aag to aapki ye panktiyan hi laga rahi hain.vastav me sthiti yahi hai aur yadi aap kuchh kar sakte ho to avashay karna.akele ki chinta n karna.kyonki..
main akela hi chala tha janibe manjil magar,log sath aate gaye karvan badhta gaya...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत बढ़िया रचना ..ऐसा ही आक्रोश शायद कुछ बदलाव ला सके ..

Satish said...

uumeed se kahi badhkar..... sayad aaj ke rajnetigo ko aaina dikha sake.

manpreet said...

आज बहुत मन खिन्न है।
दुनिया-दीन से भिन्न है।।
रोम-रोम में गाली है।
घृणा कंठ में पाली है।।

bahut hi badiya rachna hain
isme aakrosh ke sath-2 dard bhi jhalak raha hain

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी इस पोस्ट का लिंक कल शुक्रवार को (२६--११-- २०१० ) चर्चा मंच पर भी है ...

http://charchamanch.blogspot.com/

--

nagrik said...

achchhi rachanadhrmita hai

Crime Reporter said...

chaa gye paaji tussi, itni lambi aur dhmakedar kavita ke liye aap aur mai dono bdhai ke patr hai. aap itni lambi likhne k liye aur mai padne k liye. aap ka gulam. munish.

harsh said...

jo likha vo sachaie hai' sabhi nahi kuch log hain aise jihone apno ke he gardan dabai hai....

अनुपमा पाठक said...

और, सहा न जाता है।
हृदय फटा ही जाता है।।
कारा कठिन मिटानी है।
मुझको आग लगानी है।।
ओजस्वी अभिव्यक्ति!

रंजना said...

बस, इतने देर से सोच रही हूँ की आपकी इस रचना पर क्या कहूँ.......

कमोबेस ऐसा ही आक्रोश आज लगभग प्रत्येक भारतीय के मन में पल उबल रहा है, पर उसे इतने सुन्दर प्राभावशाली और प्रवाहमयी ढंग से कितने लोग कविता में उतार पाने में सक्षम होंगे ????...

आपकी रचना क्षमता ने मुग्ध कर लिया...

बहुत ही सुन्दर ढंग से आपने भावों को अभिव्यक्ति दी है...

सचमुच आज इसी स्वर में आह्वान की आवश्यकता है..

साधुवाद आपका...

anshumala said...

http://my2010ideas.blogspot.com/2010/11/blog-post_25.html

http://vichaarshoonya.blogspot.com/2010/11/blog-post_20.html


दो लिंक दे रही हु यदि समय है तो देख लीजियेगा | आप ने नारी ब्लॉग पर पूछा था की कौन से लोग है जो महिलाओ के नाक कीं छेदने के विषय में ऐसा सोचते है | पहले लिंक पर उसके पक्ष में लिखा गया है दूसरे में उसके विपक्ष में लिखा गया है लेकिन वहा आये टिप्पणियों को पढियेगा आप को सोच का एहसास हो जायेगा | धन्यवाद |

ZEAL said...

.

इतनी सुन्दर रचना पहले कभी नहीं पढ़ी। आक्रोश में बिंधी एक-एक पंक्ति एक नयी उर्जा का संचार करती है ह्रदय में। हर शब्द आज का वीभत्स सच है। मन में खेद है। उम्मीद है , देशभक्त एकजुट होंगे , लोगों में जागृति आएगी, कायरता भागेगी । और स्वाभिमान के साथ जीना सीखेंगे और अपनी मिटटी का सम्मान करना भी।

इसी सन्दर्भ में एक लेख लिखा था , समय मिले तो एक दृष्टि अवश्य डालियेगा।

क्या हिन्दुस्तान आजाद है ? पहले मुग़ल , फिर अंग्रेज़ और अब कांग्रेसी मानसिकता के गुलाम हैं हम
http://zealzen.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html

आभार।

.

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

'अदा' said...

जब अति होती है तो संवेदनशील व्यक्ति ऐसा ही सृजन कर देता है...
एक ओजस्वी प्रस्तुति है आपकी...आशा है लोग इसे ना सिर्फ़ पढ़े, आत्मसात भी करें तो अच्छा रहेगा...
आभार..

Rakesh Kumar said...

भाई जी ,आपके अंतर की आग हमारे मानस में भी आग लगाती है .यही आग बालगंगाधर तिलक ,महरिषि अरविंदो ,सुभाष चंद्र बोष और अनेक महापुरुषों के हृदय में भी सुलगी होगी.सुना है इन लोगो ने गीता जैसे महान ग्रंथों और प्राचीन महापुरुषों से प्रेरणा पाई .तो फिर हम भी क्यों ना अपने अंतर्मन के शोधन के लिए कुछ ऐसा ही प्रयत्न करें.

syedparwez said...

jaisa ki aap jante hain, aap vidwaan hain, nazariya aap ka achchaa hai lekhin congress itni bhi buri nahin jitana ki explation ho raha hai, bharat mein loktntra sthapit huye 60 varsh huye hain. ek way to sociological. adhik samay nahin huya hai. dusara pahloo yah hai ki ek bachche ko posharn age ke ander hi milana chahiye, jaise ek tree over age we can,t grow tree and child. country is just like tree. without democracy. we can't grow. today various and different type human .dunia ek nazariye se nahin chalai ja sakti. apki kavita bahut achchi hai, main aap ke samane ek bachcha hoon. I can't explain your poem -syed parwez

syedparwez said...

jaisa ki aap jante hain, aap vidwaan hain, nazariya aap ka achchaa hai lekhin congress itni bhi buri nahin jitana ki explation ho raha hai, bharat mein loktntra sthapit huye 60 varsh huye hain. ek way to sociological. adhik samay nahin huya hai. dusara pahloo yah hai ki ek bachche ko posharn age ke ander hi milana chahiye, jaise ek tree over age we can,t grow tree and child. country is just like tree. without democracy. we can't grow. today various and different type human .dunia ek nazariye se nahin chalai ja sakti. apki kavita bahut achchi hai, main aap ke samane ek bachcha hoon. I can't explain your poem -syed parwez