Sunday, July 31, 2011

अनमन


​पीर मचलती पार क्षितिज के​
छू लो मेरे मन।​
​हंस लो मेरे मन।।​
​​
​वट की स्नेहभरी छाया हो​
​फिर भी कहां पनपता जीवन?​
​कैसे कह दूं मिल जाएगा​
​तुमको सपनों का उपवन।।​
​​
​यों न लिपट जड़संकुल से​
​झूलो मानस-घन।​
​​
​शून्य ससीमित माना मैने​
​देख तुम्हारी पीड़ा पागल।​​
अंक दग्ध हो गया लहू से​
​धधक उठा ​मेरा उर घायल।।​
​​
​घूम-घूम कोने-अंतरे​
सरसो प्रेम-सुमन।।
​​
​​पीर मचलती पार क्षितिज के​
छू लो मेरे मन।​
​हंस लो मेरे मन।।​
​​

3 comments:

रश्मि प्रभा... said...

achhi lagi rachna

Navin C. Chaturvedi said...

बड़े दिनों बाद पढ़वाया आपने हमें अपने आप को|

"तुमको सपनों वाला उपवन" के माध्यम से बहुत गहरी बात कही है आपने| बधाई|

रचना दीक्षित said...

सुदर गीत अच्छा लगा पढकर. कुछ ताजगी आ गयी