About Me

My Photo
दो छंद लिखूं फिर रुक जाऊं आगे दो-दो चरण धरूं चार चरण पीछे आऊं मूढ़ मनस् को बिठा हृदय पर पार क्षितिज दौड़ा जाऊं खोज एक मैं कौन कहां अस्तित्व स्वयं को कैसे पाऊं।।

Followers

Blog Archive

तदात्मानं सृजाम्यहम्

Tuesday, January 10, 2012

ख्याल

एकबार ख्याल आया-धर्म इस संसार में कितना निंदनीय हो गया है, फिर इस पथ क्यों चलना चाहिए। फिर मैंने संगति बदल दी। अब सोचता हूं कि निंदा करने वाले हैं ही कितने और हमें धर्मपथ पर ही क्यों नहीं चलना चाहिए।

कुत्ता हड्डियां चबाता है...सूखी हड्डियां उसी की जिह्वा और जबड़े को काट डालती हैं...अपने ही खून को पीता हुआ वो कितना मगन रहता है? आज का मनुष्य भी अपवाद नहीं रहा। जीवन-रस सूख चुका है, बस ईर्ष्या और पाखंड की सूखी हड्डियां ही उसके जीवन का स्वाद रह गई हैं।

हम उसकी आवाज नहीं सुन रहे। कौन नहीं जान रहा कि जीवन एक-एक दिन मौत की ओर सरक रहा है...कालपुरुष बड़ी निर्दयता से गला घोंटने को तैयार है...चिता बिछी पड़ी है...सिर्फ कुछ श्वासों की देर है...कौन सी श्वास अंतिम होगी, बस इसी का तो इंतजार है हम सबको..

0 टिप्पणियाँ: