Sunday, March 7, 2010

हया

भय और संकोच ने
घेर लिया
कुछ क्षण को धड़कनें 
थम गईं
ऐसा लगा
चेहरा लाल हो गया
पोर-पोर ढीला
पैर कांप गए
नजर फिर गई
सच कहती हूं
मैं पहली बार 
हया के मारे मर गई..
हुआ यूं कि-
रोज  जिस आईने को -
देखती थी बन-संवरकर
उस आईने ने
देखना सीख लिया
और आज 
जब मैं 
नहा-धोकर
अचानक खड़ी हुई 
सामने
मुझ
हास्यवदना
सिक्तवसना को
चोर आंखों से 
उसने देख लिया।।

1 comment:

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।