
जिंदा देह में
दहकती सलाख
खुभने पर
किसी का रो पड़ना
उसकी कमजोरी नहीं
क्रूरता के विरुद्ध
आंसुओं का
विद्रोह है..
घात को
सह जाना
मजबूरी है
उस सहने के लिए
नयनों का
छलक जाना जरूरी है
देह का घाव
देर-अबेर
भर जाता है
और..
आंसुओं का मारा
मर जाता है।।
2 comments:
आपकी रचनाये बहुत सुन्दर हैं.
its really a heart touching poem
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