Sunday, February 14, 2010

तुक-तुक-3

उनका होना
मेरा होना
उनके होने-
में सब होना
जीवन था
कुछ और 
न होना
अहक हृदय की
मन का कोना
पोर-पोर का
फटकर रोना
अब लगता है
उन बिन होना
न कुछ होना
कुछ न होना।।

Saturday, February 13, 2010

तुक-तुक-2


साकी शराब देना
चम्मच में डालकर।
पीयेंगे, कुछ ले जायेंगे
घर भी संभालकर।।

Tuesday, February 9, 2010

तुक-तुक-1

हर शै को बख्श दे
इक आग जिगर में
ऊबे जो जिंदगी से
पी लिया करे।
कुछ जी लिया करे।।

Tuesday, February 2, 2010

स्वप्न और जिंदगी


आंख खुली होती है
स्वप्न सोया होता है
आंख बंद होती है
स्वप्न देह धरता है..
यदि जिंदगी
आंख खोलना
और
बंद करना भर है..
तो झूठ है..
कौन है-
जो स्वप्नों से
परे जीता है
और जिंदगी के
सत्य तक जागता है।।

Saturday, January 30, 2010

दर्द

कठिन नहीं होता
चुप-सी चीख 
पी जाना
पत्थर-सा
दर्द सह जाना
सच कहता हूं
कभी नहीं खलता
रक्त के बहाने 
हृदय का बह जाना
तकलीफ
तब होती है
जब 
कोई आंख मूंद
होंठ सी-कर
हंसता है 
किसी की 
पीड़ा पर
पीसता है नमक
गहरे घाव पर
थोड़े-भर 
स्वाद के लिए
और,
नमकीन मिजाज के लिए।।

Friday, January 29, 2010

प्रिये!


मुस्कुरा सकेगा समय 
बिहंस पाएगी नलिनी
पंकजाल को तोड़ 
नीलनभ 
इतराएगी 
कमलिनी
वास मधुर
मधुमास
हृदय में 
फिर नूतन-सी प्यास
प्रिये! 
भर लाया हूं
तुम भी-
आओ पास
तुम्हारे पास
आज मैं 
फिर आया हूं।।

क्षणिका-9


जिंदा देह में 
दहकती सलाख
खुभने पर
किसी का रो पड़ना
उसकी कमजोरी नहीं
क्रूरता के विरुद्ध
आंसुओं का 
विद्रोह है..
घात को
सह जाना
मजबूरी है
उस सहने के लिए
नयनों का 
छलक जाना जरूरी है
देह का घाव 
देर-अबेर
भर जाता है
और..
आंसुओं का मारा
मर जाता है।।