Sunday, October 23, 2011

दीपपर्व


हाथ में काठ लिए​
​मन में कुछ गांठ लिए​
​और झूठी ठाठ लिए​
​जीवन भर सोचते रहे​
सिर के बाल नोचते रहे​
​और सबको कोसते रहे​​
​अंधेरा हटाना है​​
​कलंक मिटाना है​
​छछूंदर को डराना है​
​दिख न सका तथ्य यह​
​भंगुर यह, मृत्य यह​
​तमस कहां सत्य यह
अजी, किसको​​ मिटाना है​
​किसको हटाना है​
​और क्यों किसी को डराना है​​
​ये जो हाथ का काठ है​
​मन की जो गांठ है​
​और झूठा जो ठाठ​ है​
​यही असल रोग है​
मृत्यु-मरण योग है​
​​मनुजता का सोग है​
जो करना-कराना है​
वो यह कि गीत एक गाना है​
​और, नन्हा-सा दीपभर जलाना है।।​
​दीपपर्व की मंगलकामनाओं के साथ-​
​आशुतोष

Wednesday, September 14, 2011

क्षणिका

रात को दिन दिनों को रात करें।​
सही-गलत सही, कुछ तो बात करें।​।​
​​कोई कहे-न कहे पर छुपी रहेगी नहीं
​चोट खाए हुए कह देंगे जज्बात हरे।​
अकल जो होती तो आ जाती ​समझ ​​
​आग दामन में लिए कौन मुलाकात करे।।
​​आंख पुरनम, जुबां पे ​खामोशी ​
टूटे हुए हमदम कहां फरियाद करें।
​न कोई उज्र न शिकायत अब है
​चल ऐ दिल, इश्क की शुरुआत करें।।​

Sunday, July 31, 2011

अनमन


​पीर मचलती पार क्षितिज के​
छू लो मेरे मन।​
​हंस लो मेरे मन।।​
​​
​वट की स्नेहभरी छाया हो​
​फिर भी कहां पनपता जीवन?​
​कैसे कह दूं मिल जाएगा​
​तुमको सपनों का उपवन।।​
​​
​यों न लिपट जड़संकुल से​
​झूलो मानस-घन।​
​​
​शून्य ससीमित माना मैने​
​देख तुम्हारी पीड़ा पागल।​​
अंक दग्ध हो गया लहू से​
​धधक उठा ​मेरा उर घायल।।​
​​
​घूम-घूम कोने-अंतरे​
सरसो प्रेम-सुमन।।
​​
​​पीर मचलती पार क्षितिज के​
छू लो मेरे मन।​
​हंस लो मेरे मन।।​
​​

Thursday, March 31, 2011

इदन्नमम


चाहता हूं जब​
​कि, कह दूं​
​खिलखिलाकर तुम हंसो​
​एक बरछी वेदना की​
​घातिनी बन बींध जाती है...​

​​चाहता हूं जब​
​कि, तुम ​
दृढ़व्रती हो कुछ कहो​​
​वज्र-सी बिजुरी​
​हृदय को चीर जाती है...​
​​
​मौन में बैठे ​
​तुम्हें​ जब देखता हूं​​
​श्वास की गहराइयों में
​निर्दयी-सी पीर​
दृगभर नाच जाती है...
​​
​चाहता संवाद मन​
​जब तुम्हारे अश्रुओं से​
​कांपती कोई हवा​
​स्वर-शिखाओं को बुझा​
दीप-उर को तोड़ जाती है...​
​​
​क्या करूं निज नेह का​
​चाहता जो तुम हंसो​​
​अधर से लिपटी​
​विषैली वेदना को पंख दो​...
​​
​क्या करूं वो भावना​
​चाहती तुम मुखर हो​​
मरण-उन्मुख आस्था को​
​निज परस से प्राण दो...
​​
​मानता...हां, मानता हूं​
​मौन सबकुछ बोलता है...​​
​शब्द के सीमांत के​
​भेद सारे खोलता है
​किंतु, मेरे आत्मन!​
​प्रीति मेरे! प्राणघन​!
कैसे कहूं-निस्तब्धता​
​अब बहुत ही दाहती है...​
मौन की विषमय तरलता
आत्मा को मारती है...​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​

Saturday, February 19, 2011

गुस्ताखी माफ़


आत्मीय जन,​ लंबे समय बाद एक क्षणिका उतरी है। सबको निवेदितl कर रहा हूं। स्वीकार करें-
​पाषाण नहीं, ये हृदयकमल है​
​यहां हलाहल वर्जित है।​
​मानसरोवर जिसका मन​
​उसके लिए समर्पित है।।​​

Saturday, December 4, 2010

स्पेक्ट्रम घोटाला


जागो मेरे देश​
​बहुत ही कठिन घड़ी है।​
​हर ओर राडिया-सी​
​सुरसा मुंहखोल खड़ी है।​।​​
​राजाओं के जाने कितने​
​छल उघड़ेंगे।​
​बरखाओं के पट से जब​
​कंचुकि खिसकेंगे।।​
​वीर तुम्हारे जाने ​कितने ​
​अभी पड़े हैं।​
​सतरंगी घोटालों में ​
​आकंठ गड़े हैं।।​
​पूंजीपतियों की आस्तीन​
में ही नाग पले।
​शनैः-शनैः टाटा-अंबानी ​
​सबके खेल खुले।।​
​क्षण में लाख-करोड़ों के​
​मसविदे तयार हुए।​
​किसने देखा कर्जतले​​
​कितने तन छार हुए।​।
सेंसेक्स की संख्या पर​
​​​खूब उछलता था।​
​कंगाल राष्ट्र बस दावों में​
​आगे बढ़ता था।​।
​राजनीति के हाथों में​
​आकर निचुड़ गए।​
​पेट गरीबों के
भूख से ​
सिकुड़ गए।।​
​सत्ता मूक-बधिर है​​​
​महिषी अंधी है।​
​दुःशासन हंस रहा​
​द्रौपदी नंगी है।।​
जुए में सब​ फंसे​
​भेद कौन खोलेगा।
​​रार ठनेगी, भीष्म ​
​अगर बोलेगा।​।
​सोचा था, कुछ न्याय​
पालिका तोलेगी।​
​और, जरूरत पड़ी​
​मूक जनता बोलेगी।।​
​भ्रष्टतंत्र के धुरविरोध में​
​लोग चलेंगे।​
​पाषाण हो चुके देव​
​तनिक तो पिघलेंगे।।​
​मुट्ठियां भिंचेंगी​
​​उर में भूचाल उठेगा।​
​​​जिस्मों पर तारी​
कायरता का जाल कटेगा।।​
​देख रहा हूं, किंतु​
यहां सब उलटा है।​
​हर शख्स मौज में​
​और, व्यवस्था जिंदा है।।​
लगता है उम्मीदें ​
सब बेमानी हैं।​
​लहू नहीं, ​​अब जिस्म​-​
​जिस्म में​ पानी है।।​​

Tuesday, November 30, 2010

नागार्जुन...गाली देकर


ऐसा नहीं है कि काव्य से मन भर गया है, न ही गद्य-लेखन में हाथ आजमाने की मंशा है। कोई धुरंधर लिक्खाड़ नहीं हूं, दूसरे शब्दों में कहें तो इसका दावा नहीं करता हूं। आजकल रोज मन उचट रहा है। रात-रात जागता हूं, दिन-दिन चिंतन करता हूं। चिंता है देश की, समाज की-आत्मघात की ओर बढ़ रही आदमीयत की। घोटालों से परदा उठना शुरू हुआ है, तो मेरे मन का कलुष धुलने लगा है। ज्योतिषी नहीं हूं परंतु आभास था कि सत्ता के पदतले बहुतों की चीख-पुकार दबी है। राजा हो या महाराजा, अब साफ होने लगा है कि प्रजा उनके लिए मात्र एक खिलौना है..खिलौना भी निर्जीव। चाहे जितना तोड़ो-मरोड़ो, कोई आह भी नहीं निकलती। यों तो मैं प्रायः सो जाता था, किंतु एक रात अचानक नागार्जुन आ खड़े हुए। पहले लगा स्वप्न देख रहा हूं, फिर सोचा कि जब सो ही नहीं रहा तो स्वप्न कैसा। देखकर हिम्मत बढ़ी। नागार्जुन बिहार के थे-कविता के जरिए कांटों का हार पहनकर निकलते थे। सौ गालियां मुझे निकालीं और कहा कि तूने पढ़ाई लिखाई काहे के लिए की। मैं बोला-पहले तो पता ही नहीं था, थोड़ा समझ बढ़ी तो लगा कि नौकरी वगैरह के लिए जरूरी है, सो पढ़ लिया। उन्होंने फिर पूछा-नौकरी क्यों की..। मैं बोला-घर-परिवार के लिए। सहसा उन्होंने घूरा और बोले-स्साले, नौकरी और घर-परिवार के लिए तो हर कोई जीता है, तुझमें अलग क्या है। मैं बोला-पता नहीं। बाबा, मेरा दिमाग मत खाओ, जो कहना है साफ-साफ कहो। रात के तीन बज रहे हैं, या तो जाओ या मझे सो जाने दो। वे मेरा सिर सहलाने लगे। फिर उन्होंने कहा-देख बेटा, तू कविता लिखता है। अच्छा लगता है। बस एक काम कर। कुछ दिनों के लिए मुझे अपने भीतर पनाह दे दे। मैंने कहा-क्यों? वे बोले-इन स्साले राजनीतिज्ञों को कुछ गाली निकालनी है। मरते समय दिल में कुछ कसक रह गई थी, सो अब तू पूरा कर लेने दे। मैं पहले तो अचकचाया, फिर मुझे लगा कि बाबा सही ही बोलता है। इस राजतंत्र में, राजनीति में बचा ही क्या है। सारा तंत्र सड़ा-गला है। आमजन इसके बोझ तले दबा मरा जा रहा है। इससे बचा कैसे जा सकता है? जाहिर है कि इसकी जड़ खोदनी होगी, इसे तबाह करना होगा। इस देश को एक बार पूरा का पूरा झाड़ना होगा। जन को कोसना होगा, धन को कोसना होगा। राजनीति को हटाना होगा, राजनेताओं को हटाना होगा। इन्हें हटाया एक ही तरीके से जा सकता है-गाली देकर। सर्वोत्तम उपाय है गाली। इन्हें ​हर कोई गरियाए, पानी पी-पीकर कोसे। आमदिन हों या चुनाव के-इनको इनके काले चिट्ठे दिखाओ। हर जन के मुंह पर स्पेक्ट्रम लग जाए ताकि एक-एक गाली अनेक रंगों से होकर आए। द्वार-द्वार पर गाली होगे-जिह्वा-जिह्वा पर आलोचना के विषस्वर हों। जो काव्य में दे सके, काव्य में दे, गद्य की विधा हो तो गद्य में-बस गाली दे। कुछ ही दिन..और आप बहुत कुछ बदलता महसूस करेंगे। और, अगर यह गाली देना शुरू न हुआ तो जल्द ही सबकुछ मरता हुआ देखेंगे। राजनीति पतन की पराकाष्टा पर पहुंच चुकी है, जन मरण के कगार पर। जागने का क्षण आज है, अभी ही। मैंने नागार्जुन को अपनी काया में पनाह दे दी है, अब बारी आपकी है।
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