ऐ गीत,
उनसे जा कहो
यों हृदय
मेरा न देखें
चंचला संध्या न देखें
सहमा हुआ
सवेरा न देखें
प्रीति के प्रारंभ में
सम्बंध सारे जोड़ लें
किंतु, इस सम्बंध की
भावना के छंद की
आज ही आयु न पूछें
घाव का घेरा न देखें।
प्रणय की हर वेदना
यों भले ही क्रूर है
किंतु, उनके प्रेम की
हर क्रूरता मंजूर है
उनके समीप में
साथ में
मैं चाहता हर घात उनका
अपने कोमल हाथ में
उनसे कहो, ऐ गीत
वो भावभर मेरा न देखें
सौन्दर्य मुझमें खूब है
विरह से झुलसा हुआ
वो मेरा चेहरा न देखें।
Friday, May 7, 2010
Wednesday, April 28, 2010
अवांछित

वो कहते हैं
जिदंगी कठिन है
गरल-की तरह
इसे जीने के लिए
पीना जरूरी है..
और कई बार..
यह भी कि-
जीते जाएं, इसलिए
बिकना मजबूरी है
बिकने के लिए-
वेश्या होना जरूरी है
मैं सोचता हूं-
क्या जिंदगी वाकई ऐसी है
पीना, बिकना और वेश्या होना
यदि जिंदगी की मजबूरी है
तो मेरे दोस्त-
तुम कहो
ऐसी जिंदगी जीना
क्योंकर जरूरी है।।
Tuesday, April 27, 2010
सबक
Wednesday, March 10, 2010
Sunday, March 7, 2010
हया
भय और संकोच ने
घेर लिया
कुछ क्षण को धड़कनें
थम गईं
ऐसा लगा
चेहरा लाल हो गया
पोर-पोर ढीला
पैर कांप गए
नजर फिर गई
सच कहती हूं
मैं पहली बार
हया के मारे मर गई..
हुआ यूं कि-
रोज जिस आईने को -
देखती थी बन-संवरकर
उस आईने ने
देखना सीख लिया
और आज
जब मैं
नहा-धोकर
अचानक खड़ी हुई
सामने
मुझ
हास्यवदना
सिक्तवसना को
चोर आंखों से
उसने देख लिया।।
घेर लिया
कुछ क्षण को धड़कनें
थम गईं
ऐसा लगा
चेहरा लाल हो गया
पोर-पोर ढीला
पैर कांप गए
नजर फिर गई
सच कहती हूं
मैं पहली बार
हया के मारे मर गई..
हुआ यूं कि-
रोज जिस आईने को -
देखती थी बन-संवरकर
उस आईने ने
देखना सीख लिया
और आज
जब मैं
नहा-धोकर
अचानक खड़ी हुई
सामने
मुझ
हास्यवदना
सिक्तवसना को
चोर आंखों से
उसने देख लिया।।
तुक-तुक
एक बार जल जाने से
अच्छा रोज सुलगना है..
घनीभूत हो धूम
एकदिन
जलकण में परिवर्तित होगा
और, किसी चातक-जीवन की
इस जल ही से प्यास बुझेगी।।
अच्छा रोज सुलगना है..
घनीभूत हो धूम
एकदिन
जलकण में परिवर्तित होगा
और, किसी चातक-जीवन की
इस जल ही से प्यास बुझेगी।।
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