जो तुम्हारा सच है और जो मेरा सच है, दोनों में ठीक उतना ही अंतर है जितना असली एवं नकली सोने में। मेरा सत्य स्वयं से दीप्त है और तुम्हारा सत्य तुम्हारी भ्रष्ट आत्मा पर चढ़ाया गया चमकीला मुलम्माभर।
वे नश्तर चुभो रहे थे...बार-बार...यहां-वहां...पूरी देह में। मैं सहता रहा...देह मेरी थी..वेदना मुझे थी...मैंने नश्तर छीना और कलेजे में उतार लिया। अब मैं वेदना से मुक्त हूं।
जब तुमपर उंगली उठे तो पहले उसकी दिशा देखो, फिर अपनी ओर। उंगली उठती ही जाए तो समझो, कि अब तलवार निकालकर उंगली उठानेवाले का हाथ काट देने का वक्त आ गया है, बशर्त्त तुम सही हो।
Wednesday, November 16, 2011
Sunday, October 23, 2011
दीपपर्व

हाथ में काठ लिए
मन में कुछ गांठ लिए
और झूठी ठाठ लिए
जीवन भर सोचते रहे
सिर के बाल नोचते रहे
और सबको कोसते रहे
अंधेरा हटाना है
कलंक मिटाना है
छछूंदर को डराना है
दिख न सका तथ्य यह
भंगुर यह, मृत्य यह
तमस कहां सत्य यह
अजी, किसको मिटाना है
किसको हटाना है
और क्यों किसी को डराना है
ये जो हाथ का काठ है
मन की जो गांठ है
और झूठा जो ठाठ है
यही असल रोग है
मृत्यु-मरण योग है
मनुजता का सोग है
जो करना-कराना है
वो यह कि गीत एक गाना है
और, नन्हा-सा दीपभर जलाना है।।
दीपपर्व की मंगलकामनाओं के साथ-
आशुतोष
Wednesday, September 14, 2011
क्षणिका
रात को दिन दिनों को रात करें।
सही-गलत सही, कुछ तो बात करें।।
कोई कहे-न कहे पर छुपी रहेगी नहीं
चोट खाए हुए कह देंगे जज्बात हरे।
अकल जो होती तो आ जाती समझ
आग दामन में लिए कौन मुलाकात करे।।
आंख पुरनम, जुबां पे खामोशी
टूटे हुए हमदम कहां फरियाद करें।
न कोई उज्र न शिकायत अब है
चल ऐ दिल, इश्क की शुरुआत करें।।
सही-गलत सही, कुछ तो बात करें।।
कोई कहे-न कहे पर छुपी रहेगी नहीं
चोट खाए हुए कह देंगे जज्बात हरे।
अकल जो होती तो आ जाती समझ
आग दामन में लिए कौन मुलाकात करे।।
आंख पुरनम, जुबां पे खामोशी
टूटे हुए हमदम कहां फरियाद करें।
न कोई उज्र न शिकायत अब है
चल ऐ दिल, इश्क की शुरुआत करें।।
Sunday, July 31, 2011
अनमन

पीर मचलती पार क्षितिज के
छू लो मेरे मन।
हंस लो मेरे मन।।
वट की स्नेहभरी छाया हो
फिर भी कहां पनपता जीवन?
कैसे कह दूं मिल जाएगा
तुमको सपनों का उपवन।।
यों न लिपट जड़संकुल से
झूलो मानस-घन।
शून्य ससीमित माना मैने
देख तुम्हारी पीड़ा पागल।
अंक दग्ध हो गया लहू से
धधक उठा मेरा उर घायल।।
घूम-घूम कोने-अंतरे
सरसो प्रेम-सुमन।।
पीर मचलती पार क्षितिज के
छू लो मेरे मन।
हंस लो मेरे मन।।
Thursday, March 31, 2011
इदन्नमम

चाहता हूं जब
कि, कह दूं
खिलखिलाकर तुम हंसो
एक बरछी वेदना की
घातिनी बन बींध जाती है...
चाहता हूं जब
कि, तुम
दृढ़व्रती हो कुछ कहो
वज्र-सी बिजुरी
हृदय को चीर जाती है...
मौन में बैठे
तुम्हें जब देखता हूं
श्वास की गहराइयों में
निर्दयी-सी पीर
दृगभर नाच जाती है...
चाहता संवाद मन
जब तुम्हारे अश्रुओं से
कांपती कोई हवा
स्वर-शिखाओं को बुझा
दीप-उर को तोड़ जाती है...
क्या करूं निज नेह का
चाहता जो तुम हंसो
अधर से लिपटी
विषैली वेदना को पंख दो...
क्या करूं वो भावना
चाहती तुम मुखर हो
मरण-उन्मुख आस्था को
निज परस से प्राण दो...
मानता...हां, मानता हूं
मौन सबकुछ बोलता है...
शब्द के सीमांत के
भेद सारे खोलता है
किंतु, मेरे आत्मन!
प्रीति मेरे! प्राणघन!
कैसे कहूं-निस्तब्धता
अब बहुत ही दाहती है...
मौन की विषमय तरलता
आत्मा को मारती है...
Saturday, February 19, 2011
गुस्ताखी माफ़
Saturday, December 4, 2010
स्पेक्ट्रम घोटाला

जागो मेरे देश
बहुत ही कठिन घड़ी है।
हर ओर राडिया-सी
सुरसा मुंहखोल खड़ी है।।
राजाओं के जाने कितने
छल उघड़ेंगे।
बरखाओं के पट से जब
कंचुकि खिसकेंगे।।
वीर तुम्हारे जाने कितने
अभी पड़े हैं।
सतरंगी घोटालों में
आकंठ गड़े हैं।।
पूंजीपतियों की आस्तीन
में ही नाग पले।
शनैः-शनैः टाटा-अंबानी
सबके खेल खुले।।
क्षण में लाख-करोड़ों के
मसविदे तयार हुए।
किसने देखा कर्जतले
कितने तन छार हुए।।
सेंसेक्स की संख्या पर
खूब उछलता था।
कंगाल राष्ट्र बस दावों में
आगे बढ़ता था।।
राजनीति के हाथों में
आकर निचुड़ गए।
पेट गरीबों के
भूख से सिकुड़ गए।।
सत्ता मूक-बधिर है
महिषी अंधी है।
दुःशासन हंस रहा
द्रौपदी नंगी है।।
जुए में सब फंसे
भेद कौन खोलेगा।
रार ठनेगी, भीष्म
अगर बोलेगा।।
सोचा था, कुछ न्याय
पालिका तोलेगी।
और, जरूरत पड़ी
मूक जनता बोलेगी।।
भ्रष्टतंत्र के धुरविरोध में
लोग चलेंगे।
पाषाण हो चुके देव
तनिक तो पिघलेंगे।।
मुट्ठियां भिंचेंगी
उर में भूचाल उठेगा।
जिस्मों पर तारी
कायरता का जाल कटेगा।।
देख रहा हूं, किंतु
यहां सब उलटा है।
हर शख्स मौज में
और, व्यवस्था जिंदा है।।
लगता है उम्मीदें
सब बेमानी हैं।
लहू नहीं, अब जिस्म-
जिस्म में पानी है।।
Subscribe to:
Posts (Atom)
