Saturday, November 13, 2010

मुर्दाघर


कभी-कभी ​
सारा दृश्य​​
​बदल जाता है
​संसार
​मुर्दाघर सा लगता है​
​लोगबाग​
​बस दौड़ती हुई लाशें​
​कभी-कभी ​
लगता है
​यहां कुछ ​
​जिंदा नहीं है​
कुछ मुर्दाखोर हैं​
​और, कुछ-
​चीर-फाड़ करने वाले​​
कृत्रिम रुदन है​
​घुटी हुई चीखें
​सड़े हुए मांस​
​और, उनसे रिसता​
​​लिजलिजापन
इस लिजलिजेपन में​
सहमी हुई-सी ​
​कुछ ​जिंदगियां..
​​मन करता है​
​उन्हें बचा लूं
​पर, ​क्या करूं
​इन मरे हुए लोगों का​
​मुर्दाखोरों का​
​​इन्हें दिलासा दूं​
​सहानुभूति जताऊं​
​व्यवस्था से​
​शिकायत करूं
अथवा, समूचे श्मशान में​
​आग लगा दूं...

Wednesday, November 3, 2010

ह्रदयदीप


हर दीया
माटी का है
बुझ जाएगा​​
तेल चुकेगा
​​बाती भी
जल जाएगी​​
तिमिर घना
घिर आएगा
घात लगेंगे​...
​​​​तन छीजेगा
मन टूटेगा
कठिन बहुत
जीना होगा
विष ही
पीना होगा​?
विष पीकर भी
प्राण धरेंगे
अमरित का
उत्सर्ग करेंगे
दीया टूटे
बाती रूठे
तेल चुके
सब साथी छूटें
किंतु, ​ तम से
हारेंगे
दीप ह्रदय का
बारेंगे
माटी के क्यों
दीप धरेंगे​​
क्षणभंगुर से
प्रीति करेंगे​!​ ​
जब तक मन
चैतन्य भरा है
और, ह्रदय में
प्रेम खरा है
हम ही बाती
दीप बनेंगे
उस चिन्मयकी
ज्योति बनेंगे
तेल नहीं यह रीतेगा
और, प्राण छीजेगा
फिर, शाश्वत
भरमन होगा
दीपोत्सव
हरक्षण होगा।।
(​आप सभी को दीपपर्व की मंगलकामना।)​

Friday, October 15, 2010

तुकतुक

बड़ी आंखों के बड़े फायदे हैं...
पानी न हो तो लोग डर जाते हैं
और पानी ज्यादा हो तो डूबकर मर जाते हैं...।।

Friday, August 20, 2010

मस्ती

हर कोई गरिया रहा
पानी पी-पी रोज।
पर महंगाई, न घटे
पिए खून की डोज।
पिए खून की डोज
ललाई खूब चढ़ी है।
जनता का खाली पेट
दिल्ली मस्त पड़ी है।


पीपली डाइंग

पीली पोली पीपली
मत कर इतना शोर।
डायन बड़ी खराब है
महंगाई बरजोर।
सत्ता ससुरी आसुरी
भरे चोर ही चोर।
खाई है, खा जाएगी
तुझे एकभर कौर।

सीधी चोट

महंगाई-भ्रष्टाचार-घोटाले
एक नहीं सौ-सौ होंगे।
कामनवेल्थ के गलियारे में
लुटनेवाले जौ-जौ होंगे।
अभी महज ये खेल बिका है
देश का बिकना बाकी है।
कलमाड़ी-से नमकहराम
जाने कितने-ठौ होंगे।।

Friday, May 7, 2010

शोकगीत

ऐ गीत,
उनसे जा कहो
यों हृदय 
मेरा न देखें
चंचला संध्या न देखें
सहमा हुआ
सवेरा न देखें
प्रीति के प्रारंभ में
सम्बंध सारे जोड़ लें
किंतु, इस सम्बंध की 
भावना के छंद की
आज ही आयु न पूछें
घाव का घेरा न देखें।
प्रणय की हर वेदना
यों भले ही क्रूर है
किंतु, उनके प्रेम की
हर क्रूरता मंजूर है
उनके समीप में
साथ में
मैं चाहता हर घात उनका
अपने कोमल हाथ में
उनसे कहो, ऐ गीत
वो भावभर मेरा न देखें
सौन्दर्य मुझमें खूब है
विरह से झुलसा हुआ
वो मेरा चेहरा न देखें।