
कभी-कभी
सारा दृश्य
बदल जाता है
संसार
मुर्दाघर सा लगता है
लोगबाग
बस दौड़ती हुई लाशें
कभी-कभी
लगता है
यहां कुछ
जिंदा नहीं है
कुछ मुर्दाखोर हैं
और, कुछ-
चीर-फाड़ करने वाले
कृत्रिम रुदन है
घुटी हुई चीखें
सड़े हुए मांस
और, उनसे रिसता
लिजलिजापन
इस लिजलिजेपन में
सहमी हुई-सी
कुछ जिंदगियां..
मन करता है
उन्हें बचा लूं
पर, क्या करूं
इन मरे हुए लोगों का
मुर्दाखोरों का
इन्हें दिलासा दूं
सहानुभूति जताऊं
व्यवस्था से
शिकायत करूं
अथवा, समूचे श्मशान में
आग लगा दूं...
